मुखड़ा
हो मैया मन के मंदिर मा वो दाई मन के
मंदिर मा,
निशदिन पूजा वो कर पावंव हो मां।
अंतरा 1/
ये नयन मुंद कर ध्यान लगाऊं आसन रतन
बिछायेव,
दाई मोर आसन रतन बिछायेव।
सुरहिन गैया के दूध दही मा प्रेम सहित
नहलावों।
हो मैया मन के मंदिर मा वो दाई मन के
मंदिर मा
निशदिन पूजा वो कर पावंव हो मां॥
अंतरा 2/
ये केशर अगर के तिलक लगाके सुमन के
हार चढ़ावंव,
दाई मोर सुमन के हार चढ़ावंव।
धूप दीप नैवेद्य आरती बहु बिधि अस्तुति
गावंव।
हो मैया मन के मंदिर मा, वो दाई मन के
मंदिर मा
निशदिन पूजा वो कर पावंव हो मां॥
अंतरा 3/
ये मधु मेवा पकवान पान फल मन के भोग
लगावंव,
दाई मोर मन के भोग लगावंव।
रुचि रुचि स्वाद करो भोजन के शीतल जल
बरसावों।
हो मैया मन के मंदिर मा वो दाई मन के मंदिर
मा
निशदिन पूजा वो कर पावंव हो मां॥
✍ लेखक: unknown
🎤 प्रस्तुतकर्ता: Jas Premi
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