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जसगीत- कलशा के दिया दाई ...
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मुखड़ा :
कलशा के दिया दाई, जलत नइहे वो,
नव दिन होगे, दरस नइहे वो ॥
कलशा के दिया दाई, जलत नइहे वो,
नव दिन होगे, दरस नइहे वो ॥
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अंतरा – 1
एकम के आहूं केहे, दूजे नइ आये वो,
तीजे मा देखेव दाई, काबर रिसायेव वो ॥
तोरे लइका वो दाई, तरस नइहे वो,
नव दिन होगे, दरस नइहे वो ॥
(मुखड़ा)
कलशा के दिया दाई, जलत नइहे वो…
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अंतरा – 2
चौथ अउ पंचमी के दाई, आसन लगायेंव वो,
छठ के आही कहिके, भोग बनायेंव वो ॥
टूटे किस्मत मोर दाई, दरस नइहे वो,
नव दिन होगे, दरस नइहे वो ॥
(मुखड़ा)
कलशा के दिया दाई, जलत नइहे वो…
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अंतरा – 3
साते अउ आठे के दाई, आंसू बहायेंव वो,
धन हे मोर भाग दाई, नवमी के आयेव वो ॥
पाके चरण ला दाई, माथ नवायेंव वो,
धन होगेव मैंहा दाई, दरस तोर पायेंव वो ॥
कलशा के दिया दाई जलत नइहे वो,
नवदिन होंगे दरश नइहे वो।
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✍ लेखक: unknown
🎤 प्रस्तुतकर्ता: Pekhanlal Sahu Dhamtari CG Jasgeet
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