मुखड़ा
रावण भयो राजा सीता हरण बर हो… (2)
हां रावण भयो राजा सीता हरण बर हो...( 2)
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अंतरा 1
विप्र रूप तुम धरे निशाचर, भिक्षा मागन बर
जाये,
लेकर भिक्षा निकले जानकी, रथ पर लिए
चढ़ाई हो…
रावण भयो राजा सीता हरण बर हो… (2)
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अंतरा 2
रथ पर बैठे जानकी माता, शरण शरण
गोहराई,
है कोई योद्धा तीनों भुवन में, रथ राखो
बिलमाई हो…
रावण भयो राजा सीता हरण बर हो… (2)
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अंतरा 3
इतना बात ला सुने जटायु, रथ राखो
बिलमाई,
अग्निबान में मारे निशाचर, चोंच पंख
जल जाई हो…
रावण भयो राजा सीता हरण बर हो… (2)
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अंतरा 4
मुक्ति के कारण तैं ले जाथस, तोरे होही
बिदाई,
तैं काली महाकाली, तोरो पैया लांगो माई
हो…
रावण भयो राजा सीता हरण बर हो… (2)
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✍ लेखक: गीतकार एवं स्वर -पेखनलाल साहू
🎤 प्रस्तुतकर्ता: Pekhanlal Sahu Dhamtari CG Jasgeet
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